चाँद जब छिपता है बादल में | चाँद शायरी | Chand Par Shayari


चाँद जब छिपता है बादल में तो लगता है रात के वक़्त एक नई सी रात हो गयी हो जैसे |

चाँद जब रहता है खुले साफ आसमान में तो लगता है रात के वक़्त मद्धम मद्धम सा कहीं दिन सा निकल गया हो जैसे |

चाँद जब बिना लालच के आँधे महीने हर दिन कल से अधिक रोशनी हम सबको देता है तो लगता है चाँद के रूप में भगवान का कोई रूप हो जैसे |


चाँद जब कभी कभी दिन के वक़्त नज़र जाता है तो लगता है चाँद सूरज से नई कोई दोस्ती कर रहा हो जैसे |

चाँद जब पेड़ों की पत्तियों के बीच में से किसी रात नज़र आता है तो लगता है चाँद पर फूल पत्तियां खिल गयी हो जैसे |

चाँद जब खुद का प्रतिबिम्ब पानी के आईने में कभी देखता है तो लगता है चाँद ने चाँद की फ़ोटोकॉपी करवाई हो जैसे |

चाँद जब नज़र नही है आता हर महीने के वो 15 दिन तो लगता है रात के वक़्त चारों ओर अंधकार में पूरा आसमान कहीं खो सा गया हो जैसे |

चाँद जब हर रात हम सबसे बड़ी दूर रहकर भी हमारी आँखों के सामने होता है तो लगता है कुछ ही लम्हों में वो चाँद धरती पर जाएगा जैसे |

चाँद जब ईद या करवा चौथ के दिन नज़र आने में हम सबको तरसाता है तो लगता है चाँद उस दिन ना जाने कितने भाव खा रहा हो जैसे |

चाँद जब रात भर अपनी बहन धरती का बिना सोए हर पल ध्यान रखता है तो लगता है भाई बहन के पावन बंधन की नई एक मिसाल हो जैसे |

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