Labour Day Poem | लेबर डे पर कविता
कर रहा हर इंसान इस संसार में मजदूरी है कही ना कही तो होगी किसी की अलग अलग कोई जो मजबूरी है अपनी ज़िंदगी में अपनी इच्छाओं को मारकर लगा है हर कोई बस यहाँ परिश्रम करने में धन चाहे जितना भी आ जाये अभिलाषाएं ज़िन्दगी भर हम सबको अपने इशारों पर नचाने की हम सबमे ये कमज़ोरी है क्योकि हर कोई है मजदूर यहाँ और कर रहा मजदूरी है || मजदूर है मजबूर मज़दूरी रोज़ करने को जी रहा है हर दिन खून के घूट अपनी ज़िंदगी में यू पीने को समझ नही वो पाता के कैसे इस उलझनों के सागर में तैर पायेगा बस हर दिन लगा पड़ा है एक हिस्सा बनकर एक ना कभी खत्म होने वाली इस रेस का क्योकि हर कोई है मजदूर यहाँ और कर रहा मजदूरी है || ज़िन्दगी में सब कुछ पा कर भी ना जाने क्या नया पाने की आजकल फितूरी है हो तक जाते है हम अपनो से जुदा ऐसी कुछ ज़िन्दगी में आगे बढ़ने की मज़बूरी है छोटी सी इस ज़िन्दगी में खुशी की...