हिंदी कविता - उम्मीदों की कश्ती
उम्मीदों की कश्ती पर सवारी किया जा रहे हैं
आसरा उस खुदा का जिसने हर लम्हा कुछ सोच रखा हम सब के लिए
कल क्या हो जाए क्या पता
हर शक्स यहां खुद ही भगवान बना बैठा है
उम्मीदों की कश्ती पर सवारी किया जा रहे हैं
हर दिन कुछ नया करने की सोचते हैं
सोचते सोचते दिन निकल जाता है फिर सोचते हैं कि कल सोचेंगे
वह कल न जाने कब आएगा
जो जिंदगी को नई राह दिखाएगा
उम्मीदों की कश्ती पर सवारी किया जा रहे हैं
जिंदगी भी क्या क्या पल दिखाती है
रोशनी होते हुए भी अंधकार की ओर ले जाती है
क्यों कर रहे हैं तकदीर से ज्यादा पाने की आस
न जाने कब टूट जाए जिंदगी की है आस
उम्मीदों की कश्ती पर सवारी किया जा रहे हैं
चाहते वह हैं जो एक पूरी होने के बाद दूसरी आ जाए
अपने चक्कर में इंसान को खूब घुमाये
जिंदगी बीत जाती है चाहतों को पूरा करने में हुजूर
कैसे इन छोटे-छोटे अरमानों पर अंकुश लगाएं
उम्मीदों की कश्ती पर सवारी किया जा रहे हैं
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