ए बारिश तू फिर से एक बार आजा | Barish Poetry


अपनी बूदों से इस हवा में फिर एक बार ताज़गी जगजा, बारिश तू फिर से एक बार आजा

कब से तरसे तेरे इंतज़ार को हम सबके नयन, बढ़ गयी है अब सुखी पड़ी इस धरती की फरमाइश, बारिश तू फिर से एक बार आजा



अब और तू इंतज़ार पे इंतज़ार हर शख्स को यहाँ ना करवा, कुछ वक्त के लिए ही सही, बारिश तू फिर से एक बार आजा

तड़प रही है ये सुखी धरती, तड़प रहे यहाँ जीव जन्तु, फसलें भी हो चुकी पक के यहाँ तैयार, छोड़के सब गीले शिकवे, बारिश तू फिर से एक बार आजा


तू जब है आती तो हवा में एक नई सी महक का अहसास होता है, तू जब आती है तो गर्मी से इज़ात चारों और है फैलती, इस अहसास से फिर से रूबरू करवाने, बारिश तू फिर से एक बार आजा

कितनी दफ़ा तो बे मौसम बारस्कर सबको आश्चर्यचकित है तू कर देती, कितनी दफ़ाआसमान के काले बादलों के बोझ को हल्का है तू कर देती, इसी परिक्रिया को फिर से एक बार दोहराजा, बारिश तू फिर से एक बार आजा

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