हिंदी कविता - लम्हा-लम्हा
लम्हा-लम्हा वक्त यूं ही गुजर जाएगा
गुजरा हुआ वक्त लौट कर वापस कभी ना आएगा
जो भी तुम्हारा है वह सब यही छूट जाएगा
लम्हा-लम्हा वक्त यूं ही गुजर जाएगा
गुजरी वक्त के साथ बस उसका एहसास ही रह जाएगा
तुम नहीं भी होंगे फिर भी इस जग में सब कुछ यूं ही चलता चला जाएगा
उम्मीद के आसरे हर इंसान हर पल को जीता है और जीता चला जाएगा
तुम जितना भी कमा लो सब का सब बस यही बस यही छूट जाएगा
लम्हा-लम्हा वक्त यूं ही गुजर जाएगा
वक्त का लम्हा न कभी रुका है ना कभी किसी के लिए रुक पायेगा
यह जमाना और ज्यादा रफ्तार से यूं ही बढ़ता चला जाएगा
इंसान अपनी इंसानियत को दिन-ब-दिन और ज्यादा भूलता चला जाएगा
वह दिन दूर नहीं जब इंसान ही इंसान का सबसे बड़ा दुश्मन कहलाएगा
लम्हा-लम्हा वक्त यूं ही गुजर जाएगा
जो आज तेरा है वह कल किसी और का हो जाएगा
यूं ही इस जिंदगी का चरखा चला है और चलता चला जाएगा
सोचकर सिर्फ गुजरा हुआ वक्त हाथ में तेरे कुछ ना आएगा
बढ़ता जा जिंदगी में हमेशा क्योंकि जो तेरे नसीब का है वह तेरे पास आज नहीं तो कल जरूर आएगा
लम्हा-लम्हा वक्त यूं ही गुजर जाएगा
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