हिंदी कविता : ज़िंदा हूँ
हिंदी कविता : ज़िंदा हूँ
तमाम उम्र गुज़र जाती है युही अंसुनि उनकहीं उलझनो मैं,
ना जाने कौन सी नई उलझन में फसने के लिए ज़िंदा हूँ
ज़ख्म पर मरहम तो बस वक़्त ही लगा पाता है,
उस सही वक़्त के आने के इंतज़ार के लिए ज़िंदा हूँ
उम्मीद की रोशनी कुछ ऐसी सी हो गयी है के दिखाई ही नहीं देती,
हर लम्हा उस रोशनी की तलाश के लिए ज़िंदा हूँ
ज़िन्दगी मैं दुःख के कारण खुशी से कई ज्यादा है,
इसी दुःख सुख भारी ज़िन्दगी को जीने के लिए ज़िंदा हूँ
किसी पल लगता है कि बस और कुछ नही बचा इस ज़िंदगी में,
फिर भी ना जाने और कौन सी अनकही अनसुनी बातें कहने सुनने के लिए ज़िंदा हूँ
डूबता सूरज और उगते हुए चाँद का वक़्त एक ही है,
इस अजब गजब नज़ारे को हर रोज़ देखने के लिए ज़िंदा हूँ
भागती चली जाती है सड़कों पर तमाम गाड़ियां,
ना जाने कौन सी ना खत्म होने वाली भीड़ में फसने के लिए ज़िंदा हूँ
चोट लगती है तो दर्द तम्माम उम्र तक रहता है,
ना जाने और कितने दर्दों को सहने के लिए ज़िंदा हूँ
हर दिन सुबह सूरज उगता है और शाम को डूब जाता है,
क्या पता कौन सी वो आखरी सुबह देखने के लिए ज़िंदा हूँ
जन्नत ढूढते ढूढते जाने कहाँ खो जाते है इस कलयुग मैं,
खोने के बाद खुद को ढूंढ़ने के प्रयास मैं ज़िंदा हूँ
मन में जो भी सोच आती है उसे युही शब्दों में बयां कर देता हु,
ना जानू और कितने किस्से सुनाने के लिए ज़िंदा हूँ
~~राहुल सप्रा~~
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