हिंदी कविता - सोच || Hindi Poetry On Life || By Rahul Sapra
राहुल सप्रा प्रस्तुति
हिंदी कविता - सोच
चलो कुछ दास्तान सुनाता हूं हमारी सोच की
सोच भरी जिंदगी की तलाश में सोच-सोच कर |
यह सोच बन गई है कि अब क्या सोचे ||
हर लम्हे में कोई नई सोच दिमाग में आती है |
सोच सोच में ही वह नई सोच बड़ी दूर तक हमें ले जाती है ||
चलो कुछ दास्तान सुनाता हूं हमारी सोच की
पलभर में ही एक सोच दूसरी सोच में इस कदर खो जाती है |
के जैसे खुले आसमान में कोई पंछी उड़ते उड़ते खो गया हो ||
सोच के अलग-अलग रूप हर रोज अलग-अलग सोच मन में लेकर आते हैं |
वह अलग-अलग रूपों को सोच सोच से जोड़कर एक अलग दुनिया में ले जाते हैं ||
चलो कुछ दास्तान सुनाता हूं हमारी सोच की
सोच किसी शख्स, किसी मुल्क की मोहताज नहीं, सोच के लिए ना ही कोई सरहद बनी है और ना ही बन पाएगी |
यह तो वह चिड़िया है जो हमेशा पंख फैलाकर बस हवा में उड़ती चली जाएगी ||
चलो कुछ दास्तान सुनाता हूं हमारी सोच की
कभी तो यह सोच बिना सोचे समझे ना जाने क्या-क्या सोचे जाए |
तो कभी जितना भी जोर लगा लो सोच कुछ भी सुझा ना पाए ||
गुजरे वक्त के साथ सोच का तजुर्बा बढ़ता रहता है |
हर नहीं सोच के साथ जिंदगी जीने का नया रुतबा मिलता रहता है ||
चलो कुछ दास्तान सुनाता हूं हमारी सोच की
सोच कभी किसी की मोहताज नहीं होती और ना ही कभी हो पाएगी |
सोच तो बस एक आजाद पंछी की तरह है जो जिंदगी भर जिंदगी के साथ चलती जाएगी ||
हर कामयाब शख्स के पीछे सोच का बहुत बड़ा हाथ होता है |
क्योंकि पहले आदमी नहीं पहले आदमी की सोच बड़ी बनती है ||
चलो कुछ दास्तान सुनाता हूं हमारी सोच की
धन्यवाद्
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